हज़रत मुहम्मद ﷺ (भाग ९)

फ़तहे मक्का (महान विजय)

      रमज़ानुल मुबारक 08 हिजरी मुताबिक़ जनवरी 630 ई० में ‘फ़तहे मक्का’’ (मक्का विजय) का शानदार वाकिया पेश आया।

      इस वाकिए की तारीखी हैसियत यह है कि हुदैबिया के समझौते में यह तै पा गया था कि अरब के क़बीले इसके लिए आज़ाद होंगे कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और कुरैश में से जिसके भी हलीफ़ (पित्र) बनना चाहे, बन जाएं। जब समझौते पर दोनों तरफ़ से दस्तखत हो गए तो फौरन अरब के क़बीला खुजाआ ने एलान किया कि हम मुसलमानों के हलीफ़ होना पसन्द करते हैं और क़बीला बनूबक्र ने कहा कि हम कुरैश के हलीफ़ बनना चाहते हैं और दोनों क़बीले इस तरह अलग-अलग दो जमाअतों के हलीफ़ हो गए।

      लगभग डेढ़ साल तो समझौते पर हर दो तरफ़ से पूरी तरह अमल होता रहा, लेकिन डेढ़ साल बाद एक नया वाकिया पेश आया। वह यह कि बनी खुजाआ और बनू बक्र के दर्मियान अर्से से लड़ाई-झगड़े का सिलसिला जारी रह चुका था, जो इस दर्मियानी मुद्दत में अगरचे बन्द रहा, मगर अचानक किसी बात पर फिर लड़ाई छिड़ गई और बनूबक्र एक रात को ज़नीरा नामी जगह में बनू खुजाआ पर जा चढ़े। कुरैश को जब यह मालूम हुआ तो उन्होंने आपस में मश्विरा किया और कहने लगे, रात का वक़्त है और मुसलमान यहां से बहुत दूर हैं, आज मौक़ा है कि बनी खुजाआ को पैगम्बरे इस्लाम के हलीफ़ होने का मज़ा चखाया जाए। चुनांचे उन्होंने भी बनी-बक्र का साथ देते हुए बनी खुजाआ को तहे तेग करना शुरू कर दिया।

      अन बिन सालिम ने जब यह हाल देखा तो एक वाद लेकर दरबारे कुदसी में इस्तिगासा किया और बनी खुजाआ की दर्दनाक हालत को पेश करते हुए मदद का तालिब हुआ। नबी अकरम सल्लल्लाहु व सल्लम ने इर्शाद फरमाया- खुदा की कसम मैं जिस चीज़ को अपनी ज़ात से रोकूगा, तुमको भी उससे ज़रूर महफूज रखूगा।’

      इधर कुरैश को यह इल्म हुआ तो वे दौड़े, अपनी वेजा हरकत पर शर्मिंदा हुए और उन्होंने अबू सुफ़ियान को इस बात पर लगाया कि वह मदीना जाए और मुसलमानों के भड़कने को दूर करने की यह तदबीर करे कि कुरैश चाहते हैं कि पिछले समझौते की मुद्दत में और इज़ाफ़ा हो जाए और नए सिरे से समझोते की तौसीक़ हो जाए।

      अबू सुफियान मदीना पहुंच कर सबसे पहले अपनी बेटी उम्मे हबीबा (रजि) के घर में दाखिल हुए, जो नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की जीवन-साथी थीं, अबू सुफ़ियान ने ज्यों ही इरादा किया कि नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के बिछे हुए बिस्तर पर बैठ जाए, उम्मे हबीबा (रजि) ने फ़ौरन उसको समेट दिया और कहने लगीं, ‘बाप! यह अल्लाह के नबी का बिछौना है।’

      अबू सुफ़ियान ने कहा कि ‘फिर क्या हुआ, मैं तेरा बाप हूं।’

      उम्मे हबीबा ने कहा, यह सही है, मगर तू मुशरिक है और ख़ुदा के पैग़म्बर का पाक बिस्तर।

      अबू सुफ़ियान अगरचे वहां से उस वक्त बड़बड़ाता हुआ चला गया, मगर हैरत में डाल देने वाले इस वाक़िये ने उसकी आंखें खोल दी और वह समझा कि हकीक़ते हाल क्या है?

      ग़रज़ वह दरबारे अक़दस में हाज़िर हुआ और अर्ज़-मारूज़ करने लगा। आपने मालूम किया, यह तज्दीद  व तौसीक़ की क्या ज़रूरत है? क्या कोई नया वाकिया पेश आ गया है? अबू सुफ़ियान ने अर्ज़ किया, नहीं, कोई नई बात नहीं है।

      तब आपने इर्शाद फ़रमाया कि तुम मुतमइन रहो कि हम अपने अहद पर क़ायम हैं।

      अबू सुफियान इस जवाब को सुनकर मुतमइन न हुआ। इसलिए कि वह हकीक़ते हाल को छिपाकर झूठ बोल चुका था और चाहता था कि इस तरह नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को धोखा देकर अपना मक़सद पूरा कर ले। लेकिन इसी साफ़ और सच्चे जवाब ने ओस डाल दी और उसका मक़सद पूरा न हो सका, तब उसने सिद्दीक़े अकबर (रजि), फ़ारूक़े आज़म (रजि), अली हैदर (रजि) की ख़िदमत में हाज़िर होकर अलग-अलग बातें कीं और चाहा कि मामला कुरैश की ख्वाहिश के मुताबिक़ तय हो जाए लेकिन उसकी मुराद पूरी न हो सकी और बिना किसी कामयाबी के नाकाम व नामुराद मक्का वापस गया। 

      नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने सिद्दीक़े अकबर (रजि) को सूरतेहाल की खबर दी। हज़रत सिद्दीक़े अकबर अबूबक्र सिद्दीक़ (रजि) ने अर्ज़ किया ‘ऐ अल्लाह के रसूल ! हमारे और कुरैश के दर्मियान तो समझौता है? आप ने इर्शाद फ़रमाया- ‘मगर कुरैश ने खुद अहद तोड़ा है।’

      अब जिहाद की तैयारी शुरू हुई मगर आमतौर से किसी को मालूम न हो सका कि किस तरफ़ का इरादा है। आपने मदीना के आसपास आम ऐलान कर दिया कि जो आदमी भी अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान रखता है, वह रमज़ान तक मदीना पहुंच जाए। आप पूरी कोशिश फ़रमा रहे थे कि किसी तरह हमारी तैयारी का हाल कुरैश को न मालूम हो पाए, क्योंकि आपकी दिली ख्वाहिश यह थी कि मक्के में लड़ाई न छिड़ने पाए और कुरैश रौब खाकर हार मान लें कि इसी बीच एक हादसा पेश आ गया। 

हातिब बिन अबी बलतआ का वाकिया

      हातिब बिन अबी बलतआ एक बद्री सहाबी थे उनके बाल-बच्चे मक्का ही में थे कि यह सूरतेहाल पेश आ गई। उन्होंने यह ख्याल करते हुए कि इस वाकिए का हाल बहरहाल मुशरिकों को मालूम हो ही जाएगा सो अगर मैं भी मक्का के कुरैश को इसकी इत्तिला कर दूं तो हमारा (मुसलमानों का) कोई नुकसान भी नहीं होगा और मैं उनकी हमदर्दी हासिल करके अपने घर वालों को उनके ख़तरों से भी महफूज़ रख सकूँगा।

      मक्का के मुश्रिकों के नाम एक ख़त लिख दिया। नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को अल्लाह को वह्य़ के ज़रिए यह मालूम हो गया और आपने हज़रत अली (रजि), मिक्दाद (रजि) और ज़ुबैर (रजि) को इस पर लगाया कि रौज़ा खाख़ जाओ, वहां ऊंट पर सवार औरत मिलेगी वह जासूस है। उसके पास एक ख़त है, वह उससे छीन लो। ये लोग रोज़ा ख़ख़ पहुंचे तो औरत को मौजूद पाया, उन्होंने खत की मांग की, औरत ने इंकार किया कि मेरे पास कोई ख़त नहीं है मगर जब उन्होंने जामा तलाशी की धमकी दी तो मजबूर होकर उसने सर के बालों में से एक परचा निकाल कर दिया।

      यह परचा जब नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम की खिदमत में पेश हुआ तो वह हज़रत हातिब का खत था। नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने उनकी जानिब मुख़ातिब होकर इर्शाद फरमाया- हातिब! यह क्या? हातिब ने अर्ज़ किया, ‘ऐ अल्लाह के रसूल! जल्दी न फ़रमाएं, यह खत मैंने इसलिए लिखा कि मैं जानता हूं कि मदीने में मुक़ीम सब मुहाजिरों का मक्का के कुरैशियों के साथ किसी न किसी क़िस्म का रिश्ता और ताल्लुक है। एक मैं ही ऐसा हूं जिसका उनके साथ कोई रिश्ता नहीं है तो मैंने यह सिर्फ इस यक़ीन पर किया है कि मुसलमानों को तो इस बात से कोई नुक्सान नहीं होगा और मैं इस तरह कुरैश की हमदर्दी हासिल करके अपने बाल-बच्चों को महफूज़ कर सकूँगा। ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल०! ख़ुदा की क़सम मैंने हरगिज़ यह काम इर्तिदाद और कुफ़्र की नीयत से नहीं किया, मैं अब भी ‘इस्लाम का शैदाई और फ़िदाई हूं।’

      नबी अकरम (ﷺ) ने यह सुनकर इर्शाद फरमाया- ‘हातिब ने तुम्हारे सामने सच-सच बात कह दी।

      हज़रत उमर (रजि) ने अर्ज़ किया- ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल०! मुझको इजाज़त दीजिए कि मैं मुनाफ़िक़ की गर्दन उड़ा दूं।

      नबी अकरम (ﷺ) ने इर्शाद फ़रमाया – ‘हातिब बद्र के मुजाहिद हैं और अल्लाह ने बद्र में शरीक होने वालों के लिए यह इर्शाद फ़रमाया है कि- ‘अमिलू माशेतुम फ़क़द ग़फ़रतु लकुम’ हातिब के वाकिए पर ही क़ुरआन की यह आयत उतरी –

      तर्जुमा- ‘ऐ ईमान वालो! न पकड़ो मेरे और अपने दुश्मनों को दोस्त, उनको पैगाम भेजते हो दोस्ती से और वे इंकारी हुए है उससे जो तुमको आया सच्चा दीन, निकालते हैं रसूल को और तुमको इस पर कि तुम मानो अल्लाह अपने रब को, अगर तुम निकले हो लड़ाई को मेरी राह में और चाह कर मेरी रज़ामंदी, तुम उनको छिपे पैगाम भेजते हो दोस्ती के और मुझको खूब मालूम है जो छुपाया तुमने और जो खोला तुमने और जो कोई तुम में यह काम करे वह भूला सीधी राह।’ (60:1)

      बहरहाल रमज़ान की शुरुआती तारीखें थीं कि ज़ाते अक़दस सल्लल्लाहु “अलैहि व सल्लम दस हज़ार जॉनिसारों के साथ मक्का की तरफ चले। आप जब कदीद और अस्फ़ान के दर्मियान क़दीद तक पहुंचे तो देखा कि मुसलमानों पर रोज़े की सख्ती हद से आगे बढ़ रही है, तब आपने पानी तलब फ़रमाया और मज्मे के सामने पिया (बुख़ारी), ताकि सहाबा देख लें और समझ लें कि सफ़र और फिर जिहाद के मौक़े पर इफ्तार की इजाज़त है और क़ुरआन की दी हुई रुखसत का यही मतलब है।

      इसी सफर में ज़ाते अक़दस के चचा हज़रत अब्बास (रजि) मुसलमान होकर खिदमत में हाज़िर हुए। आपने हुक्म दिया कि बाल बच्चों को मदीना भेज दो और तुम हमारे साथ रहो।।

      इस्लामी लश्कर जब मक्का के करीब पहुंचा तो अबू सुफ़ियान छुपकर लश्कर का सही अन्दाज़ा कर रहे थे कि अचानक मुसलमानों ने गिरफ्तार करके खिदमते अक़दस में पेश किया। आपने अबू सुफ़ियान पर करम की निगाह डालते हुए माफ़ कर दिया और क़ैद से आज़ाद कर दिया। अबू सुफ़ियान ‘दुनियाओं के लिए रहमत’ सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का यह बर्ताव देखा तो फ़ौरन इस्लाम कुबूल कर लिया। इसी तरह अब्दुल्लाह बिन अबी उमैया भी इस्लाम के शैदाई बनकर खिदमत में हाज़िर हुए और इर्शाद फ़रमाया –

      ‘तुम पर आज कोई इलज़ाम नहीं। अल्लाह तुम्हारा कुसूर माफ़ करे और वह सब मेहरबानों से ज़्यादा मेहरबान है।’ (6:92)

      नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हज़रत अब्बास रज़ि० से फ़रमाया कि अबू सुफ़ियान को अभी मक्का वापस न जाने दो और सामने की पहाड़ी पर ले जाओ, ताकि वह मुसलमानों की ताक़त व शौकत का अन्दाज़ा कर सके।

      अबू सुफियान और हज़रत अब्बास (रजि) पहाड़ी पर खड़े हुए इस्लामी लश्कर का नज़ारा कर रहे थे और मुहाजिरीन और अंसार कबीलों के जुदा-जुदा अपने परचम लहराते हुए सामने से गुज़र रहे थे और अबू सुफ़ियान उनको देख-देख कर मुतास्सिर हो रहे थे कि अंसारी कबीले का एक लश्कर पास से गुज़रा। उस लश्कर का झंडा हज़रत साद बिन उबादा रज़ि० के हाथ में था। उन्होंने अबू सुफियान को देखा तो जोश में आकर कहने लंगे आज का दिन जंग का दिन है, आज काबा में जंग हलाल है। अबू सुफियान की नस्ली अस्बियत भड़क उठी और कहने लगा ऐ अब्बास! लड़ाई का दिन मुबारक हो।

      जब सब लश्कर इसी तरह गुज़र गए तो आखिर में एक छोटी-सी जमाअत के साथ सरवरे दो आलम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम सामने से गुज़रे। हज़रत जुबैर (रजि) के हाथ में झंडा था और आगे-आगे चल रहे थे। अबू सुफ़ियान की निगाह जब नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम पर पड़ी तो उसने खिदमते अक़दस में साद और अपने दर्मियान की बात-चीत का हाल सुनाया, यह सुन कर ज़ाते अक़दस सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इर्शाद फ़रमाया–

      “साद ने झूठ कहा (आज का दिन वह दिन है कि अल्लाह तआला उसमें काबा की अज़मत को बुलन्द करेगा और काबे पर गिलाफ़ चढ़ाया जाएगा।) और यह फ़रमा कर हज़रत साद को बरतरफ़ करके झंडे और फ़ौज की सरबराही हज़रत साद के बेटे को अता कर दी।

      अब नबी अकरम ने हज़रत ख़ालिद बिन वलीद (रजि) को हुक्म फरमाया कि तुम मक्का के निचले हिस्से की तरफ़ से दाखिल होना और किसी को क़त्ल न करना, हां अगर कोई खुद आगे बढ़े तो बचाव की इजाज़त है और खुद मक्का के बुलन्द हिस्से से दाखिल हुए। हज़रत खालिद (रजि) से कुछ क़बीले के लोग टकराए, इसलिए उनके हाथों कुछ क़त्ल हो गए, लेकिन नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम बिना किसी रुकावट के मक्का में दाखिल हुए। 

      जब मुर्रजहरान में हज़रत अब्बास (रजि) ने अबू सुफियान को इस्लाम कुबूल करने के लिए खिदमते अक़दस में पेश किया था, तो यह भी अर्ज़ किया था, ऐ अल्लाह के रसूल ! अबू सुफियान में फ़ख्र का माद्दा है, इसलिए इसको अगर कोई इम्तियाज़ी हैसियत नसीब हो जाए तो बेहतर हो।

      आपने इर्शाद फ़रमाया, जो आदमी अबू सुफ़ियान के मकान में दाखिल हो जाएगा, उसको अमान है।

      ग़रज़ जब आप इज़्ज़त व इज़लाल के साय मक्का में दाखिल हुए तो उस वक्त यह एलान करा दिया –

1. जो मकान बन्द करके बैठ जाए, उसको अम्र है,

2. जो अबू सुफ़ियान के मकान में पनाह ले, उसको अमान है, 

3. जो मस्जिदे हराम में पनाह ले, उसको अमान है।

      अलबत्ता इस आम अमान और ज़बरदस्त माफ़ी के रवैए से कुछ ऐसी हस्तियों को अलग कर दिया जिन्होंने इस्लाम के खिलाफ़ बड़ा जहर फैलाया था और मुसलमानों को तकलीफ़ पहुंचाने में बहुत ज़्यादा हिस्सा लिया था, मगर उनमें से अकसर उस वक्त छुप गए या फ़रार हो गए और धीरे-धीरे आम माफ़ी का फयदा उठा कर मुसलमान हो गए।

      नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मक्का में इस शान से दाखिल हुए कि आपका झंडा सफ़ेद रंग का था और उसमें बना उक़ाब काले रंग का था। सर पर मग़फ़र ओढ़े और उस पर स्याह अमामा बांधे हुए थे और सूरः ‘इन्ना फ़तहना‘ पढ़ते हुए आयतों को ऊंची आवाज़ से दोहराते जाते थे और तवाज़ो का यह सालम था कि अल्लाह के दरबार में खुशूअ खुजूअ के साथ ऊंटनी पर इस दर्जा झुके हुए थे कि मुबारक चेहरा ऊंटनी की पीठ को मस कर रहा था। 

बुत-शिकनी 

      जब नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मस्जिदे हराम में दाखिल हुए तो सबसे पहले आपने हुक्म फरमाया कि काबे से तमाम बुत्त निकाल कर फेंक दिए जाएं और दीवारों पर जो तस्वीरें नक्श हैं, वे मिटा दी जाएं। चुनाचे जब तीन सौ साठ बुतों के टूटने का वक्त आया तो दो मूर्तियां हज़रत इब्राहीम (अलै.) और हज़रत इस्माईल (अलै.) की इस हालत में सामने आई कि उनके हाथों में बांसो के तीर थे। आपने देखकर फ़रमाया खुदा उन मुशिरकों को मारे, ये खूब जानते थे कि ये दोनों मुकद्दस हस्तियां उस नापाक बात से मुक़द्दस और पाक थीं।

      नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने काबे का तवाफ़ किया और फिर बुतों के सामने खड़े होकर लकड़ी से उनको चरका देते जाते और पढ़ते जाते थे; ‘हक आ पहुंचा और बातिल उड़ गया और बातिल न किसी चीज़ को पैदा करे और न फेरकर लाए (यानी बातिल तो खुद फना होने के लिए है) 

रहमतुल्लिल आलमीन की शान 

      काबा जब बुतों की नजासत और नापाकी से पाक कर दिया गया तो नबी अकरम (ﷺ) काबे में दाखिल हुए और उसके कोनों में घूमते हुए ऊंची आवाज़ से तक्बीरें कहते रहे और नमाज़ नफ़्ल अदा की, बाहर तशरीफ़ लाए तो इब्राहीमी मुसल्ले पर जाकर नमाज़ अदा की। जब आप और सहाबा वुजू फरमा रहे थे तो मुशरिक दांतों तले उंगली दबाए हैरान खड़े थे कि इस कामियाबी और कामरानी के बावजूद न फ़तह की कामरानी का जुनून है, न किब्र व नख़वत का इज़हार, बल्कि दरबारे इलाही में बन्दगी के इज़हार के लिए हर एक मुजाहिद बेताब नज़र आता है। बेशक यह ‘बादशाही’ नहीं है, बल्कि दूसरी ही कोई दुनिया है।

(तारीखे इब्ने कसीर 5-256) 

      आप नमाज़ से फारिग हुए तो हज़रत अली (रजि) ने अर्ज़ किया, ऐ अल्लाह के रसूल सल्ल! आप हमारे लिए दो ख़िदमतें ‘हिजाबा और सकाया’ जमा फरमा दीजिए और काबा की कुंजी हमारे हवाले कर दीजिए, लेकिन नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हज़रत अली (रजि) के कई बार अर्ज़ करने का कोई जवाब न दिया और बार-बार यही फ़रमाया, उस्मान बिन तलहा कहां हैं? जब उस्मान हाज़िर हुए तो आपने काबा की कुंजी उनके हवाले करते हुए इर्शाद फ़रमाया, लो यह अपनी कुंजी आज का दिन भलाई और अहद के वफ़ा का दिन है।’

      नोट : यह वही उस्मान बिन तलहा हैं जिन्होंने, काबा की कुंजी तलब करने पर नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को नहीं दी थी, लेकिन रहमतुल्लिल आलमीन के दरबार में बदला लेना बे-हकीकत चीज़ थी इसलिए आपने उन्हीं के खानदान में यह सआदत बाक़ी रहने दी। यही खानदान आज तक काबे का मुजाबिर और शेबी के लकब से मशहूर है, क्योंकि हज़रत उस्मान बिन तलहा (रजि) बनू शेबा में से थे।

      अब लोग इन्तिज़ार में थे कि देखिए जिन मुशिरकों ने सालों तक आपको और मुसलमानों को हर क़िस्म की तकलीफ़ पहुंचाई, मुसीबतों में डाला, आज उनके साथ क्या मामला होता है? 

      आपने तमाम कुरैशी कैदियों को हाज़िर होने का हुक्म दिया, जब सब खिदमते अक़दस में पेश हुए तो आपने मालूम किया, ‘ऐ कुरैशी गिरोह! तुम्हारा क्या ख्याल है कि मैं तुम्हारे साथ किस तरह पेश आऊं? उन्होंने जवाब दिया, हम आपसे खैर की उम्मीद रखते हैं।’

      आपने यह सुनकर इर्शाद फरमाया, “जाओ तुम सब आज़ाद हो।”

      यह सुनना था कि न सिर्फ कुरैश बल्कि हर सोचने-समझने वाले के सामने यह हक़ीक़त रोशन हो गई कि बादशाह और पैग़म्बर की ज़िंदगी का इम्तियाज़ी निशान क्या है? पैगम्बराना ज़िंदगी न जाती अदावत व कदूरत को कोई वक़अत देती है और न उसका गैज़ व गज़ब नफ्सानी ख्वाहिश के ताबे होता है। एक नबी को अगर सब्र आज़मा हद तक तकलीफ़ दी जाए और फिर तकलीफ़ देने वाला आदमी रहम की तलब करे तो वह बेशक ‘माफ़ी और करम’ ही पाएगा और अच्छे अख़्लाक़ के हर पहलू का मुजाहरा देखेगा।

      चुनांचे इस दर्मियान में जब एक आदमी लरज़ता, कांपता आपकी खिदमत में हाज़िर हुआ तो आपने मिठास भरे लेहजे में इर्शाद फ़रमाया, घबराओ नहीं, मैं कोई बादशाह नहीं हूं मैं तो सूखा गोश्त खाने वाली एक कुरैशी औरत ही का बेटा हूं। इसी रहम व माफ़ी का यह नतीजा निकला कि कुरैश के सरदार गिरोह दर गिरोह ख़िदमत में हाज़िर होते और इस्लाम की दौलत से मालामाल होकर सआदत हासिल कर लेते थे। चुनांचे हज़रत मुआविया (रजि) और हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ (रजि) के वालिद अबू कहाफ़ा जैसे लोग उसी दिन मुसलमान हुए।

ख़ुत्बा

      नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने इस मौक़े पर एक अहम ख़ुत्बा भी दिया जो इस्लाम के बहुत से हुक्मों की बुनियाद है। इस खुतबे के कुछ अहम एलान ये हैं –

1. मुस्लिम और गैर-मुस्लिम एक दूसरे के वारिस नहीं हो सकते।

2. मामलों और फैसलों में मुद्दई के जिम्मे गवाहों का पेश करना और गवाहों के न होने पर मुद्दआ अलैह के ज़िम्मे हलफ़ उठाना है।

3. किसी औरत को तीन दिन का सफ़र बगैर महरम के दुरुस्त नहीं है।

4. सुबह और अस्र के बाद कोई नफल नमाज़ नहीं है और ईदुल फित्र और ईदुल अज़हा के दिन रोज़ा जायज़ नहीं है।

5. ऐ कुरैश के गिरोह! बेशक अल्लाह तआला ने तुमसे जाहिलियत पर और बाप-दादा के नाम व नसब पर फ़ख्र करने का खात्मा कर दिया है। होशियार रहो कि तमाम इंसानी दुनिया आदम से है और आदम की तख्तीक मिट्टी से की गई है

      तर्जुमा– ‘ऐ आदमियो! हमने तुमको बनाया एक नर और मादा से और रखी तुम्हारी ज़ातें, और गोतें ताकि आपस की पहचान हो, मुक़र्रर इज़्ज़त अल्लाह के यहां उसी की बड़ी जिसका अदब बड़ा। अल्लाह सब जानता है खबरदार।’ (49:13)

फ़तहे मक्का और क़ुरआन

      सूर; “फतह, ‘हदीद’ ‘नस्र’ इन तीनों सूरतों में अल्लाह तआला ने मक्का की फतह  के बारे में इर्शाद फ़रमाए हैं, जैसे सूरः फतह में है

      तर्जुमा- ‘तुममें बराबर नहीं हैं वे कि जिसने खर्च किया फ़तहे मक्का के पहले और जिहाद किया। इन लोगों का दर्जा बड़ा है उनसे जो कि ख़र्च करें फतहे मक्का के बाद और जिहाद करें और सबसे वायदा किया है अल्लाह ने खुबी का।’ (57:10)

      और सूरः नस्र में है

      तर्जुमा- ‘जब आ जाए अल्लाह की मदद और फ़तहे मक्का और तुम देखो लोगों को कि वे अल्लाह के दीन में फ़ौज-फौज करके दाखिल होने लगें।’ (110:1-2)

      यहां पूरी उम्मत एक राय है कि “फ़तह’ से मुराद फ़तहे-मक्का है। हाफ़िज़ इब्ने हजर रह० इमाम शाबी रह० से नकल फ़रमाते हैं-

      ‘इन्ना फ़तहना ल-क फ़तहम मुबीना’ में ‘फ़तहे मुबीन’ हुदैबिया-समझौता की तरफ इशारा है और ‘फ़ ज-अ-ल मिन दूनि ज़ालि क-फ़तहन क़रीबा’ में “फ़तहे करीब’ में से भी हुदैबिया समझौते के ही फल और नतीजे मुराद हैं और सूरः नस्र की आयत ‘इज़ा जा-अ नस-रुल्लाहि वल-फ़तहु’ में नस्र व फ़तह से सबके नजदीक ‘फ़तहे मक्का’ मुराद है और इस नक़ल के बाद लिखते हैं –

      ‘इन आयतों के मफ़हूम व मुराद में हुदैबिया-समझौता और मक्का जीत से मुताल्लिक जो अलग-अलग क़ौल पाए जाते हैं और मुश्किल पैदा करने की वजह बनते हैं, शाबी की इस तक़रीर से तमाम क़ौलों में मेल भी हो जाता है और इश्काल भी दूर हो जाता है।सूरः फ़तह, नस्र और हदीद की ऊपर की आयतों में मुराद ‘मक्का की फ़तह’ है या हुदैबिया की सुलह इस बारे में अलग-अलग कौल और रिवायतें हैं और इमाम शाबी की तवज्जोह और उस पर हाफ़िजे हदीस इब्ने हजर की ताईद व तस्दीक़ के पढ़ने के बाद भी हम यह कहने की जुर्रत कर सकते हैं कि सूरः फ़तह में ‘फ़तहे मुबीन’, ‘नसरुन अज़ीज़’ र ‘फतहुनक़रीब’ का ज़िक्र और फिर सूरः हदीद में अल्लाह के रास्ते के जिहाद और ख़र्च को अल-फ़तह के पहले और बाद के साथ दों।

      और फ़ज़ीलतों की तक़सीम का तज़्किरा और फिर सूरःनस्र की एक आयत ‘नसरुल्लाह वल फ़तहु’ में ‘अन्नसरु वल फ़तहु’ का इज्तिमाई ज़िक्र साफ़-साफ़ इस हक़ीक़त का एलान है कि इन जगहों पर ऐसे वाकियों का ज़िक्र है जिसकी शुरुआत जिहाद व किताल से होकर एक ऐसी फतह व नुसरत का नतीजा दे रही है जिसके बाद हिजाज़ की धरती हमेशा के लिए शिर्क व बुतपरस्ती से पाक हो जाए और ज़ाहिर है कि यह शरफ़ बेशक मक्का को ही हासिल है।

      अलबत्ता इसमें भी शुबहा नहीं कि सुलह हुदेबिया के वक्त सूरः अल-फ़तह का नाज़िल होना और ‘इन्ना फ़तहना-ल-क-फ़तहम मुबीना’ को बयान करने का अंदाज़ भी यह वाज़ेह करता है कि सुलह हुदैबिया चूँकि अपनी वजहों और नतीजों और असरात (भावों के लिहाज़ से फ़तहे मक्का का पेश-खेमा और उसके लिए तम्हीद साबित हुई इसलिए वह भी ‘फ़तह मुबीन’ (खुली जीत) कहलाने की हक़दार है यानी वह वाकिया ‘फ़तहे करीब’, ‘नस्र अज़ीज़’ और ‘अल-फ़तह‘, ‘नस्र‘ की वजह हो वह यक़ीनन ‘फ़तहे मुबीन कहलाने का हक़ रखता है।

To be continued …